ആദ്യത്തെ 200 വരികൾ.
समीर बंगारा - भूपेश पांड्या की याद में
NETFLIX ओरिजिनल फ़िल्म
अरे, मटकी यहीं टँगी है, देखो। भूत-प्रेत का लंच बॉक्स है ये।
यहीं रोकता हूँं। तो पता करते हैं।
रोको।
हे भगवान।
अरे, ये शिवेंद्र भाई का घर यही है?
आप गद्दा लेकर आए हैं? यही है।
आलोक।
अबे, गजनी लग रहे हो, गुरु।
परचून।
हँसी-मज़ाक का मौका नहीं है ये।
हाँ, 27, 28 साल का ही तो था।
हाँ, आस्तिक नाम था।
पाँच ही महीने पहले तो हुई थी शादी।
ओह, संध्या? वो तो बेचारी अपने कमरे में ही है।
कल से बाहर ही नहीं निकली।
अरे, नहीं। मांगलिक नहीं है।
उषा जीजी ने पूरी जन्मपत्री मिलाई थी।
अम्मा! टूथपेस्ट तुम्हारे सूटकेस में है?
खोले कहाँ हैं अपना सूटकेस। इतने सारे लोग आए हैं। किसी से भी माँग लो।
हाँ, अचिंत है।
हाँ, बड़ा हो गया है।
सुनो।
हम तुमको बोले थे, हम पेप्सोडेंट ही इस्तेमाल करते हैं।
तो इंतज़ार करो। देते हैं अभी हम।
हद हो गई।
नखरेबाज़ी देखिए इन लड़कों की।
शोक में आए हैं, मगर पेप्सोडेंट चाहिए।
तुलिका मौसी, नमस्ते।
संध्या…
ठीक है?
सुना कुछ ज़्यादा ही…
जीजी, गुल्लू दीदी का फ़ोन है, बहराइच से।
सरोज बुआ की लड़की, जिनका पति आईएएस है।
क्या बताएँ अब कैसे हो गया।
नहीं, घाट तो हो आए… सभी।
नहीं इन्होंने कहा, "अब क्या फ़ायदा सबका इंतज़ार करके?"
अब तो जिसको जाना था, वो तो चला ही गया।
राधे-राधे।
हाँ। वो भी ठीक ही हैं।
अबे, यार। नहा रहे हैं, भाई।
ये गद्दे का हर दिन का रेट क्या लगाया?
पैंतीस रुपए।
कोई लूट मची है क्या?
अरे, नहीं, सर। वो रिज़वी साहब को पता है, आपका लड़का गुज़र गया।
इसीलिए 20 फ़ीसदी छूट पहले से काट के दिया है।
हमें एहसान नहीं चाहिए।
हमारा लड़का गुज़र गया है।
हम छूट नहीं माँग रहे।
पच्चीस रुपए का रेट है। हम वो देंगे।
संध्या…
हाँ, अब सबको उसी की फ़िक्र है, बस।
"एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा
आँख हैरान है क्या शख्श ज़माने से उठा"
"आरआईपी।"
"भगवान आपकी आत्मा को…"
"शांति दे।"
-सब कॉपी-पेस्ट किया। -
कृपया दरवाज़ा खोलें।
-कृपया दरवाज़ा खोलें। -
ये घंटी बदलवाओ, यार।
कृपया दरवाज़ा खोलें।
संध्या कहाँ है?
-मम्मी! -
पापा, संज्ञा और स्नेहू नहीं आए?
बस, मम्मी।
बस, मम्मी। कितना रोओगी?
चाय भिजवाते हैं।
- अम्मा। -हाँ।
- हम चाय नहीं पिएँगे। -ठीक है।
एक पेप्सी मँगवा दीजिए।
परचून ले आएगा अपनी दुकान से।
ऐसे समय पर पेप्सी?
ठीक है, अम्मा, रहने दीजिए।
चाय नहीं पिएँगे हम।
तू ठीक है?
- अम्मा। -हाँ?
अम्मा, ये हमारे कमरे से पलंग कौन निकाले हैं?
-पता नहीं। - हम निकलवाए हैं।
-क्यों? -क्योंकि आस्तिक अभी भी यहीं है।
तेरह दिन तक आत्मा घर के बाहर रहती है।
टाँगे हो न वो मटकी पेड़ पर? आस्तिक का खाना-पीना उसी में है।
दस दिन तक पिंड से प्रेत-शरीर बनता है।
और 13वें दिन, प्रेत-शरीर यमलोक की यात्रा को निकल पड़ता है।
तुमने आस्तिक का अंतिम संस्कार किया है।
तो नियम से रहना है तेरहवीं तक।
सिगरेट, शराब, गुटखा, सब बंद।
दिन में एक बार खाना, बिना हल्दी, लहसुन, प्याज के।
और ज़मीन पर सोना, सबसे अलग।
ये सब पहले तो बताए नहीं आप?
तो इतना नहीं कर सकते भाई के लिए?
बताना भूल गए, पापा चाय में चीनी नहीं लेते।
- -अबे, आराम से।
अगर हम मरे होते, तो सुलाती अम्मा आस्तिक भाई को ऐसे ज़मीन पर?
हाँ?
अबे, अगर तुम मरे होते, तो लाश होते न फिर।
तुमको क्या फ़र्क पड़ता इतना?
उठो बे, हटो यहाँ से।
सारा फ़र्ज़-ज़िम्मेदारी हमारा ही है क्या?
आस्तिक भाई किसी के लिए कुछ किए हैं?
अब मरने के बाद भी दिक्कत।
भाभी विधवा और हम गंजे।
बताओ। और तुम्हारी अंग्रेज़ी की ट्यूशन, वो भी तो बंद हो गई।
नहीं?
पहले कम-से-कम तुम भाभी से पढ़ तो लेते थे।
-रहने दो, हम करते हैं। -हाँ?
बैठो।
कितने दिन का सामान लाए?
तेरहवीं तक तो रुकेंगे, बेटा।
यहाँ?
हाँ। क्यों?
नहीं रह पाओगे।
अंग्रेज़ी वाला कमोड नहीं है यहाँ।
इंडियन स्टाइल है।
कैसे बैठोगे?
हमें तो पाँच महीने में भी आदत नहीं पड़ी।
संध्या का कुछ ठीक नहीं है।
हमें तो लग रहा है कुछ गड़बड़ है। उषा भाभी कुछ बता ही नहीं रही हैं।
जानकी दीदी?
- तुलिका? -तू कब आई?
नमस्कार, भाई साहब।
अभी। अभी तो पहुँचे हैं।
कल रात को शिबू भाई साहब का फ़ोन आ गया।
हम तो डर गए।
हमें लगा अम्मा गईं।
अब बतलाओ, भईया, आस्तिक का कौन सोच सकता था।
"हम तो बस ऊपर वाले की कठपुतलियाँ हैं।
वो जब चाहें हमें उठा लेते हैं।"
शेक्सपियर।
अंग्रेज़ी शायरी है। कैसे बोल लेते हैं आप?
हम तो बूझ ही न पाते।
खाना तैयार है। आइए आप।
-हाँ। -जी।
पति छोड़ गया है इसका।
बताती नहीं है, लेकिन जानते सभी हैं।
दुबई में है वो।
क्यों, अम्मा? हम्म?
उषा।
धत्, अम्मा।
उषा आपकी बहू है।
हम आपकी बिटिया हैं, जानकी।
सब भूल गईं।
अच्छा, सुनो।
ये सोने-वोने का क्या इंतज़ाम है यहाँ पर?
कृपया दरवाज़ा खोलें।
अरे, तार काटो, यार, इसका।
कृपया दरवाज़ा खोलें।
कृपया दरवाज़ा खोलें।
माफ़ कीजिएगा, वो…
नमस्ते।
शिवेंद्र गिरी जी का घर यही है?
हम नाज़िया ज़ैदी हैं।
नाज़िया!
इसको यहीं छोड़ दो। हम पहुँचा देंगे।
जी।
नाज़िया… ज़ैदी।
फेसबुक से पता चला, यार।
-स्नेहू ने पोस्ट किया था। -
दो सौ पैंतीस कमेंट हैं।
भाभी।
भाभी, वो शिबू चाचा बोले कि सामान आपके कमरे में रख दें।
-रख दें? - हम्म।
चलो।
लाओ, हम रख दें।
-परचून। -जी, भाभी?
तुम्हारी दुकान खुली है?
हाँ, खुली है। आपको कुछ चाहिए?
हाँ। नाज़िया दीदी के लिए एक पेप्सी।
जी।
और एक पैकेट चिप्स।
मसाले वाले।
आलोक भी नहीं खा पाया ये खाना।
लाते हैं।
-अम्मा… - चुपचाप खाओ।
-सब्ज़ी दें और? -हम्म?
कोई कुछ खा ही नहीं रहा है।
गिरीश जी, संध्या से बात करके देखिए…
कुछ दिन आपके साथ रहना चाहे तो।
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