पहली 200 पंक्तियाँ।
दुनिया में पर्याप्त सामग्री है हर किसी की ज़रूरत के लिए, लालच के लिए नहीं। -महात्मा गाँधी
पहला अध्याय
1918, तुम्बाड़ गांव, पश्चिमी भारत
दूसरा अध्याय
पंद्रह साल बाद
- मैनेकशॉ के लिए सामान? - मेरी प्रेमिका के लिए तोहफ़ा है।
पता नहीं था कि आप इतने दानी हो।
- वो तुम्हारे लिए काम करता है? - कौन?
वही जो पिछले कुछ हफ़्तों से तुम्हारे घर में लगातार आ रहा है।
कौन है वो?
तुम जो भी करने की योजना बना रहे हो, वो तुरंत करो।
वो अफ़ीम का परमिट तुम्हारा हो सकता है, लेकिन सिर्फ़ अभी के लिए।
ऐसा हमेशा नहीं रहेगा।
सुनो।
शायद मेरा प्रमोशन होने वाला है। फिर इस जंगल से निकल जाऊँगा।
फिर सुप्रिटेंडेंट से तुम्हें मिलाने वाला कोई नहीं होगा।
तुम्हारे पास एक महीना है!
मैंने अपना हिस्सा 2,000 कर दिया।
मेरा प्रमोशन हो गया है।
अमीर बनने का ये तुम्हारा आख़िरी मौका है।
कौन है वो?
मेरी बहु!
दो दिन।
दो।
अंतिम अध्याय
चौदह साल बाद, 1947 आज़ाद भारत
तुम्बाड़
पूर्ति की देवी,
अंतहीन सोने और अनाज का प्रतीक है।
और ये पृथ्वी, देवी की कोख़ है।
जब ब्रह्माण्ड की शुरुआत हुई,
तो देवी ने इसी कोख से सोलह करोड़ देवी-देवताओं को जन्म दिया।
पर देवी को सबसे ज़्यादा प्यार था अपनी पहली संतान से।
हस्तर से।
पर आज किसी भी वेद पुराण में ढूंढ़ लें, उसका नाम नहीं मिलेगा।
ऐसा क्यों, बाबा?
क्योंकि उसे देवी का सारा सोना और अनाज पाना था।
सोना तो उसने मनमानी से उठा लिया,
पर जैसे ही वो अनाज की ओर बढ़ा,
बाकी देवताओं ने उस पर प्रहार करना शुरू किया।
देवताओं के हर वार से वो तिनकों में बिखरता चला गया।
पर इससे पहले कि वो ब्रह्माण्ड की धूल में हमेशा के लिए मिल जाता,
देवी ने उसे बचा लिया।
पर उसे बचाने की एक शर्त थी
कि उसे कोई नहीं पूजेगा और उसका नाम हमेशा के लिए भुला दिया जाएगा।
कई युग बीत गए, हस्तर अपनी माँ की कोख में सोता रहा।
पर एक दिन हमारे ही पूर्वजों ने उसे याद किया
और उसके नाम का मंदिर बना दिया।
कहते हैं उस दिन से देवताओं का क्रोध
तुम्बाड़ पर बारिश बनकर बरस रहा है।
पर हमने उसे जगाया ही क्यों?
क्योंकि हस्तर का श्राप हमारे लिए वरदान है।
मतलब?
जब तू अंदर जाएगा
तो समझ जाएगा।
अंदर कहाँ?
देवी की कोख में।
जल्दी कीजिए,
संध्या होने को आई है।
अब जो वक़्त लगेगा वो तो लगेगा ना।
बुढ़िया को खाना देने में देर हो गई तो घबराहट सी होने लगती है।
कहीं उठ न जाए?
ऐसी बात मत कर संध्या काल में।
वो नहीं उठने वाली।
वक़्त पर जाना है तो जल्दी आया कर।
आपने कहा था इस अमावस के बाद वो मुद्रा दे देंगे।
सोने की मुद्रा, क्या मज़ाक है! कमाओ।
माँ कहाँ गई?
यहीं ठहर।
माँ कहाँ गई?
और कहाँ, सरकार के वाड़े में गई होगी।
बुढ़िया को कौन खिलाएगा?
माँ वापस आ के खिला देगी।
- देर हो गई तो? - चुप।
बुढ़िया जाग गई तो?
वो सोते हुए खाती है?
हाँ।
धीरे-धीरे मुँह में डालो, निगल लेती है।
उठती है?
नहीं।
तुमने पहले कभी खिलाया है?
नहीं।
- ले। - क्या?
ये क्या है?
मैंने बनाया ना, तू दे।
जा।
चल जा, वरना वो उठ जाएगी।
जा, डर मत।
मैं बोल रहा हूँ, जा।
सदाशिव!
आज उसने मुद्रा दी?
बात ही नहीं निकली।
वो हरामी क्या सामने से बात निकालेगा?
अपने बाप को गाली देगा?
उसे बोल,
कि वो हमें मुद्रा नहीं देगा तो हम भी उसकी बुढ़िया का ध्यान नहीं रखेंगे।
पूरे गांव में कोई है जो उसके पास भी जाए?
मुद्रा क्या मज़ाक है?
कमानी पड़ेगी।
हुंह, बारह साल से कमा ही रही है।
माँ!
मुझे जाने दो।
नहीं चाहिए।
नहीं चाहिए खज़ाना।
मुझे जाने दो।
छोड़ दो।
आ जा, आ जा।
ए।
- खाना दे दे। - सो जा, वरना हस्तर आ जाएगा।
माँ?
सरकार मर गया।
पता है।
रात को खाना होते ही बोरिया बिस्तर बांधना शुरू करेंगे।
हम तुम्बाड़ छोड़ रहे है।
- अब यहाँ कुछ नहीं बचा। - क्यों?
वाड़ा तो अपना हुआ ना? वहाँ और कौन है?
वाड़े में क्या भूखे मरेंगे?
एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी उस वाड़े की।
गांव के लोग तो हमारे नज़दीक भी नहीं आना चाहते।
वाड़े में जो खज़ाना है, वो तो अपना होगा ना।
सरकार पूरी ज़िंदगी ढूंढ़ता रहा, कुछ नहीं मिला उसे।
पुरखों की सारी कमाई भी उड़ा दी।
और उस बुढ़िया का क्या?
अब हमें क्या? उसे वहीं पड़ा रहने दो।
उसे उठाएं क्या?
वो सरकार की परनानी है।
खज़ाने के बारे में वो कुछ न कुछ तो ज़रूर जानती होगी।
जा!
जा!
जा ना।
उठा और पूछ उससे।
कल भोर होते ही हम लोग ये गांव छोड़ेंगे।
रात को सतारा जाएंगे, वहां से पुणे।
खज़ाने की बात करना भी अशुभ है।
तो मैंने कब की?
पुणे क्या है?
बहुत बड़ा गांव है।
वहाँ रास्तों पर गाड़ियाँ घूमती हैं, बिना बैल-घोड़े की, अपने आप।
छी, तुम पर तो विश्वास ही नहीं रहा।
अच्छा है।
सदाशिव!
सदाशिव!
सदाशिव!
माँ!
माँ!
सदाशिव, सोना मत!
कल सवेरे तक घर वापस आ जाऊँगी।
माँ, बुढ़िया के खाने का क्या?
- आज तुझे ही खिलाना पड़ेगा। - उठ गई तो?
उठ गई तो बोलना,
"सो जा वरना, हस्तर आ जाएगा।"
हस्तर कौन?
चलो। काका, चलो। जल्दी चलो।
चलो!
- माँ? - तू जा!
तू जा!
जा ना!
सदा, कुछ नहीं होगा बेटा, मैं हूँ ना।
माई।
अभी भी वैद्य के पास जाना है,
या शमशान ले चलूँ?
वाड़ा ले चलो।
कौन है ये,
राजा बेटा?
आ जा!
आ जा!
खोल दे, बेटा।
खोल दे।
बहुत भूख लगी है।
खोल दे।
खज़ाना!
चाहिए?
खज़ाना!
आ जा!
आ जा!
खोल दे।
लालटेन हटा!
लालटेन हटा।
दादी।
बेटा।
- आ जा। - दादी।
ये देख।
तितली!
आ जा।
खज़ाना कहाँ है?
- दादी जी? - हरामखोरों ने...
मुँह पे कीलें मार के रखी हैं, देख।
इसमें खाना डाल दे, मैं खा लूंगी।
वाड़े में है?
वाड़े में है क्या?
भूख लगी है।
ओए, खाना दे,
फिर बताती हूँ।
या मैं तुझे खा जाऊँ?
सो जा वरना...
क्या था?
सो जा, वरना...
सो जा, वरना...
हिरण आ जाएगा। नहीं! सो जा...
सो जा, वरना मगर आ जाएगा।
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